सफलता की सीढ़ियाँ ..... Steps to success.....
सफलता की सीढ़ियाँ यानि Steps to success.....आज के समय सबसे कठिन विषय है । सभी सफल होना चाहते हैं और सभी सफलता का मजा भी लेना चाहते हैं । मैं आपको एक कुंजी देना चाहता हूँ । यह कुंजी कीमती है । इसकी कीमत बस इतनी है कि आपको मुझे फालो करना होगा । धन्यवाद ।
सफलता को प्राप्त करना एक सहज और नैसर्गिक प्रक्रिया है । ईश्वर ने हमें जिस काम के लिए इस दुनिया में भेजा है वह काम ही हमें करना है । बात सिर्फ काम के कीर्तमान की स्थापना से है । हर काम की अपनी उच्चता होती है वहाँ तक पहुँचने की सीढ़ियाँ हमें नहीं दिखती हैं और हम नाकाम यानि असफल हो जाते हैं । सफलता के लिए हमें देखना होता है कि हमारी ताकत कितनी है , सामर्थ्य कितना है , कौशल कितना है और साथ में कमियाँ कितनी हैं । हमें यह सब अच्छाई और बुराई को चिन्हित करना होगा और आज के अपने स्तर को समझना भी होगा ।
एक क्षण के लिए खुद को देखिये
और सोचें कि हम खुद को क्यों समझें ?
यदि आप इस प्रश्न को गंभीरता से ले तो इसका आसान सा उत्तर है
:-
1.
इसलिए कि आप खुद को इतना विकसित नहीं
कर सके हैं जितना चाहते हैं ?
यह कारण आपकी यात्रा से जुड़ा है । मंजिल नहीं मिली । अपेक्षाएँ पूरी
नहीं हुई। खेल में खूब लड़े लेकिन अंत में मेडल पाने से वंचित रहे । यह समय है फिर
से तैयारी का । फिर से खड़े होने का । फिर से मेडल पाने वाले ट्रिक्स को समझने का ।
यह समय है खुद में सुधार करने का .......
2. इसलिए कि आप
संतुष्ट तो हैं फिर भी कुछ और पाना चाहते हैं ?
यह आपके मन को बेचैन करने वाली बात है कि आप कुछ और पाना चाहते हैं । कुछ और धन सम्पदा । कुछ और नयी मंजिलों तक पहुँचने की ख्वाहिश । कुछ ऐसा कि आप अपनी बाकी की ज़िंदगी सुख चैन सम्मान से उस स्तर पर गुजारें जिस स्तर पर अभी वाकई में आप नहीं हैं । आपकी इस बेचैनी के पीछे आपको देखना चाहिए कि यह तमन्ना कितनी जायज है और कितनी सहज है , कहीं यह पाना किसी वजह से बड़ा खोना न साबित हो । साँप सीढ़ी के गेम की तरह आप ऊंचाई से धरातल पर न पहुँच जाएँ ।
3.
इसलिए कि आप बेहतर इंसान हैं लेकिन
दूसरे ऐसी धारणा क्यों नहीं रखते ?
आपकी बेहतरी क्या है ,
यह समझना उतना ही कठिन है जितना यह समझना कि दूसरा व्यक्ति आपसे चाहता क्या है ।
समस्या आपकी वर्तमान छवि नहीं है । बल्कि समस्या आपकी अनुकूलता दूसरे के लिए कितनी
उचित और सहज है इस बात को तय करना । बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर ।
इन सब का आकलन करना ही होगा यह उस सिक्के का दूसरा पहलू है जिस पर
आपको विचार करना है ताकि आपकी धारणा आपकी छवि आपकी साख सम्मान दूसरों को प्रभावित
करे और करती भी रहे ...
4. इसलिए क्यों कि आप अपने को आज से बेहतर स्थित में रखना चाहते हैं ?
आज से बेहतर की स्थित आपको व्यवसायी या उद्धयमी बनाती
है । यह गतिशीलता की पहचान है । यह एक नाविक और उसकी पतवार के सामर्थ्य की पहचान
है जो अपनी नाव को धार मझधार से गुजारता हुआ मन माफिक किनारा प्राप्त करना चाहता
है । यहाँ आप को समझना होगा । आप सच्चाई में कितने कुशल हैं । आपकी खुद की शक्ति क्या है । आपकी कौन से कमियाँ हैं । आपकी
बंदिश क्या है । आपकी सीमाएं क्या हैं । आप लक्ष्य से कितनी दूर हैं । क्या यह समय
और परिवेश आपके अनुकूल है । आपके आज की तुलना में ज्यादा बेहतर विकास की राह कहीं
वर्तमान के लिए जोखिम तो नहीं है । आपके लोग इस विषय में क्या राय या मशविरा दे
रहें हैं । क्रिकेट में रन आउट होने की परिस्थिति को आपको समझना होगा ........
5.
इसलिए
क्यों कि आप अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहते है ?
आप की सफलता के साथ आपके परिवार की अपेक्षाएँ जुड़ी हैं । आप किसी के
पुत्र हैं या पुत्री हैं । माता पिता आपसे बहुत सी आशाएँ रखते हैं , वे लगातार दिन रात आपके विषय में ही सोच विचार करते
हैं । उनकी कुछ योजनाएँ हैं जिनका पूरा होना आपकी उपलब्धि पर निर्भर है । यह भी हो
सकता है कि आपके माता पिता आप पर ही निर्भर हों । माता पिता का स्थान आपका परिवार , पत्नी कोई भी हो सकता है जो आपसे अपेक्षा रखते हैं । यह आपका समाज या
आपका कार्य क्षेत्र भी हो सकता है । यही आपकी चिंता का कारण है कि आप अपने लिए
नहीं बल्कि दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना
चाहते है ? । यही समस्या है जिसके लिए आप को खुद को
समझना है, अपना विस्तार कुछ इस तरह से करना है जैसे विपरीत
बहाव में कुशल नाविक अपनी किश्ती के लिए करते हैं । बस यही धारणा अपने मन में धरण
करें । अपनी किश्ती की मजबूती देखें , इसके कमजोर बिन्दु
जांच लें , अपने चप्पू का कुशल संचालन जाने और पतवार को दिशा
दें यानि अपनी मोटीवेशन , प्रेरणा ,
कामिटमेंट – संकल्पों पर अडिग रहें । बहुत सहज होगा फिर आगे की राह ।
6.
इसलिए
क्यों कि आप विरक्ति की तरफ जाना चाहते हैं,
आपका मन उचाट है ?
स्याह लंबी रातों की तरह असफलताओं के दौर , भाग्य या करिश्मा का किंचित अभाव , हर तरफ अंधेरा , निराशा , टूटन और मानसिक तनाव – दबाव हमें इतना हीन ग्रसित कर देता है कि हमें आगे की राह ही नहीं सूझती है । हमें यह अनुभूति होती है जैसे दुनिया में सब लोग एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पहुँच रहे हैं , सभी लोग ट्रेन में सवार हैं , सबके पास किसी भी प्रकार से हंसिल किया हुआ ट्रेन टिकट है । लेकिन आपके पास न तो उस स्टेशन का नाम पता है जहां आपको जाना है और न ही ट्रेन में बैठने की पात्रता । आप प्लेटफॉर्म पर बेमकसद हैं । उद्देश्यहीन और अलग थलग । विरक्त होने के दरवाजे पर आप प्रवेश को उन्मुख हो रहे हैं । इस अंतर्दशा – मनोदशा में आप को खुद को तत्काल समझने की अवश्यकता है । बात विरक्ति और उचाट होने की नहीं है । बात सिर्फ इतनी है कि पात्र व्यक्ति और आप में भौतिक अंतर क्या है और इसे कैसे पाटा जाय । यदि आप खुद को समझने के क्रम में डाल दें तो निश्चित ही स्थित उलट होने में बस कुछ ही समय का इंतिज़ार है ....
7. इसलिए क्यों कि अब आप पूरी तरह हार चुकें हैं ?
कहीं पढ़ा था कि “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए -जंग में – वो तिफ्ल
क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले”
कहने का सीधा अर्थ है कि निपुड़ घुड़सवार ही लड़ाई के मैदान में गिरते हैं और जो
घुटनो के बल चल रहे हैं वे गिरते नहीं । जिंदिगी का कोई भी क्षेत्र हो जहां जीत है
वहाँ हार भी होगी । हर प्रयास के अंत में दो चीज ही है सफलता या असफलता । लेकिन
पूरी तरह हार का होना संभव नहीं है , यह मानसिक हीन भावना से
निकला शब्द है । हर हार यानि फेल्यूर से हमें सीख मिलती है ,
कुछ नए अनुभव और प्रयोग हमें प्राप्त होते हैं जो अगली बार हमें या तो जीत दिला
देते हैं या जीत के नजदीक पहुंचा देते हैं । जरूरत है इस मनोदशा को समझना और उचित
निर्णय लेना । इतिहास गवाह है कि इस प्रकार के असफल हो रहे व्यक्ति ही सफलता के
कीर्तिमान बना देते हैं । यह मान लें की जीतने वाले व्यक्ति और हारने वाले व्यक्ति
के बीच सिर्फ थोड़ा सा अंतर है और वह अंतर है उस आग की ज्वाला जो उनके दिल और दिमाग
पर गेम की शुरुआत पर प्रज्वलित हो ......








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